Monday, 26 January 2015
घबराकर लौट गया सिकंदर सिकंदर महान् था ! महान् तो था उसका गुरू ! जो उसमें कम से कम यह तो भाव भर सका कि वह महान् है !अब महान् किसको कहते हैं, यह तो उसका गुरू भी नहीं जानता होगा ! इसलिये सिकंदर ने मारकाट को ही महानता समझा ।किसी की स्वतन्त्रता पर अधिकार करना, उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके तन, मन, धन, भू, भूमि, स्त्री, संपत्ति आदि सब को बलात् अपना समझना और उनका मनमाना उपयोग करना तथा ऐसा करने की क्षमता होने को ही वह महानता मानता था । चल दिया वह यूनान से । सारे जगत् पर अधिकार करने के लिए, ता कि उसे महान् माना जाये । देशों को जीतता हुआ अर्थात् मारकाट मचाता हुआ, वह आगे बढ़ता गया । संसार के सीधे साधे लोग किसी से शत्रुता रखते ही नहीं थे, इसलिए लड़ाई, लूटपाट, हत्या के अभ्यासी नहीं थे । शीघ्र ही चारों ओर आतंक फैल गया । वह महान् नहीं था, आतंकवादी था, लुटेरा था । ऊपर से अपने को महान् और कहता था । वह भारत की ओर बढ़ा ! इधर उसे कठिनाई आने लगी । इधर के लोग भी अजीब थे और इधर की घरती भी ! यूनानी सेना को जिधर समतल प्रतीत होता उधर पहाड़ निकल आता, जहां पहाड़ प्रतीत होता वहां पर नदी बह रही होती, जिसे वे नदी समझते वह समतल होता ! जिसे नदी या सागर समझते वह सूखा ही सूखा होता । अद्भुत् माया थी इधर उधर । सेना आगे नहीं बढ़ पा रही थी । यूनानी सैनिकों ने अपने सिकंदर को बताया कि यह भूमि एक योगी की है । वह बड़ा मायावी है । उसने भैरवनाथ नाम का एक गुप्त देवता प्रत्येक चौराहे पर क्षेत्रपाल कर के बिठा रखा है । शत्रु भाव से आने वाला कोई भी व्यक्ति उस देवता की दृष्टि से बच नहीं सकता है । कहीं आग, कहीं दलदल, कहीं झाड़-झंखाड़, कहीं नदी, कहीं पहाड़ जब देखो तब सैनिकों के मार्ग में अकस्मात् आ खड़े होते हैं । सेना भयभीत है । आगे बढ़ने का साहस भी उसमें नहीं बचा है । सिकंदर ने कहा कि हमें इस भूमि को अवश्य जीतना है । इस भूमि को एक ओर छोड़ कर आगे बढ़ने में दो समस्याएं हैं । एक यह कि हम हारे हुए माने जायेंगे जो कि हमारी महानता में दाग होगा ! दूसरा यह कि यह भी नहीं पता कि उसकी यह भूमि कहां तक है ! सैनिकों ने कहा कि चरवाहे बता रहे हैं कि यह सारा देश योगी की योग-भूमि है । वे कहते हैं कि उन योगी महाराज की अनुमति के बिना तो इस भूमि पर कोई पराया परिन्दा पर भी नहीं मार सकता, तुम सैनिक तो हो ही किस खेत की गाजर मूली ! सैनिकों ने सिकन्दर को यह भी बताया कि उस योगी के प्रभाव से ये साधारण से लगने वाले चरवाहे भी बहुत अल्हड़, उद्दण्ड और निडर हो रहे हैं । सैनिकों को आने जाने में भी टोकते हैं ! इधर मत जाओ, इधर गायें चर रहीं हैं, इधर घोड़ा मत दौडाओ, गायों पर धूल गिरेगी, माता की आंखों में धूल जायेगी, तुम को दिखता नहीं है क्या ? सैनिकों ने कहा, ''एक सैनिक ने चरवाहे की नहीं मानी, उसे चरवाहे का अहंकार सहन नहीं हुआ, उसने घोड़ा आगे बढ़ा दिया । उस बाल किशोर चरवाहे ने दूर से ही उस घोड़े को अपनी लाठी दिखायी और जोर से बोला . '' छू छू मन्तर छू छू '' ! बस तुरन्त ही घोड़ा अपने सवार सहित मूर्छित होकर चारों खाने चित्त धरती पर गिर गया ।'' ''आस पास के बहुत से छोटे बड़े ग्वाले एकत्र होकर हम सैनिकों का मजाक उडाने लगे -''बढ़ो, बढ़ो, आगे बढ़ो, यह योगी की भूमि है । हमारी शान्त धरा-माता पर हमारी गो माताएं शान्ति से घास चर रहीं हैं, वह तुम को नहीं सुहाता है ! रक्त पिपासु उत्पाती आततायियों, यहां रक्त बहाने की भूल न करना । यहां योग बहता है, योग ! यहां घी दूध की नदियां बहती हैं । इस हमारी माता को दूषित, कलुषित करने का दुस्साहस मत करना ।'' सिकन्दर ने सेना को रोक दिया । पहले अपने सेनापति के साथ योगी से मिलने का निश्चय उसने किया । ग्वालों के माध्यम से उसे पता चल ही गया था कि वह योगी कोई साधारण योगी नहीं है । वहां श्रद्धा भाव से ही जाया जा सकता है, सेना लेकर नहीं । अत: विवश होकर वह सेनापति के साथ अकेला ही चला । बहुत दूर तक उपवन के समान फैले समतल भूभाग के मध्य एक ऊंचा टीला था । वह बहुत ही रमणीय स्थान था । एक दिव्य देवालय वहां बना हुआ था ! अखण्ड रूप से प्रज्वलित एक निर्धूम धूणा सबका ध्यान आकर्षित कर रहा था । बाबाजियों के लिए तीन चार साधारण कुटियाएं इधर उधर बनी हुईं थीं ।कोई सशस्त्र रक्षा व्यवस्था वहां नहीं थी । चारों ओर शान्ति का साम्राज्य पसरा हुआ था । सिकन्दर ने योगी से कहा कि वह विश्व विजेता बनने के लिये भारत को जीतना चाहता है, अत: आगे बढ़ने के लिये आप की भूमि का उपयोग करने दीजिये ! योगी ने कहा -''यह धरती हमारी माता है । यह कोई सम्पत्ति नहीं कि किसी पराये को दे दी जाये । माता भोग्या नहीं, पूज्या होती है । क्या तुम तुम्हारी मां को किसी को दे सकते हो ?'' सिकन्दर आग बबूला हो गया, चिल्लाता सा बोला . ''कैसी बातें करते हो ! जबान सम्हाल कर बोलो मूर्ख ! जानते हो मैं सिकन्दर महान् हूं !'' योगी ने बिना किसी आवेश के कहा -''मारकाट से कोई महान् नहीं होता सिकन्दर ! तू तो हत्यारा है । विध्वंसक है । तू बिगाड़ सकता है, बना नहीं सकता ! तू महान् कैसे हुआ ! महान् तो वह है, जो बनाता है । जो बना नहीं सकता, उसे बिगाड़ने का क्या अधिकार है । जो जिला नहीं सकता, उसे मारने का क्या अधिकार है ।'' सिकन्दर को कोई उत्तर नहीं सूझा । जीवन में पहली बार उसे निरूत्तर होना पड़ा । वह तो लौह तलवार की भाषा समझता था । वाणी की तलवार की धार उसने पहली बार देखी । तब भी उसने साहस कर पूछा -''आप कैसे कह सकते हैं कि यह धरती आप की माता है । यह धरती निष्प्राण है, यह माता कैसे हो सकती है ?'' योगी ने कहा . ''माता बेटों की बात मानती है । यह धरती भी हम बेटों बात मानती है ! यह तुम जैसे अक्कल के दुश्मनों को कभी भी आगे नहीं जाने देगी !'' सिकन्दर को आगे बढ़ने में कठिनाई हो ही रही थी ! इसलिए योगी की यह चेतावनी तो उसे समझ में आ रही थी कि वह आगे नहीं जा सकेगा !इसे वह योगी का चमत्कार ही मान रहा था ! परन्तु धरती से मा-बेटे का सम्बन्ध होता है, यह उसे समझ में नहीं आ रहा था ।वह योगी की बातों से हतोत्साहित हो रहा था, तो भी उसने साहस बटोरा और योगी से पूछा –‘’आप कैसे कह सकते हैं कि धरती आप की बात मानती है ?’’ वह योगी अपने आसन पर खड़ा हो गया और धरती को हाथ जोड़ कर प्रार्थना कि 'हे माता आप मुझे स्थान दे दीजिये ।'इतना सुनना था कि भीषण ध्वनि के साथ भूमि फट गयी, योगी सशरीर उसमें समा गया, तुरन्त धरती पूर्ववत् भी हो गयी । समाचार वायुवेग से चारों फैल गया । झुण्ड के झुण्ड लोग गोरक्षनाथ जी महाराज की जयजयकार करते हुए आने लगे ! सिकन्दर भयभीत हो गया । उसे ज्ञात हो चुका था कि ये तो विश्व प्रसिद्ध गुरू गोरक्षनाथ जी महाराज हैं ! वह अपनी सेना चुपचाप लौटा ले गया । पुनश्च -'गोरख टीला' के नाम से प्रसिद्ध उस स्थान पर ही पुराकाल में श्रीराम लक्ष्मण को गुरू गोरक्षनाथ जी महाराज ने योग दीक्षा दी थी ।सिद्ध है कि त्रेता युग से ही वह स्थान गुरू गोरक्षनाथ जी महाराज की तपस्थली रहा है । नटेश्वरी पंथ का उद्गम भी इस दिव्य स्थान से हुआ है ।ज्ञातव्य है कि गुरू गोरखनाथ जी महाराज तो अमरकाय हैं ! वे शून्यावतार हैं । न उनका जन्म होता है, न उनकी मृत्यु होती है । संसार में जब उनकी आवश्यकता होती है तब वे शून्य में से प्रकट हो जाते हैं और कार्य सम्पन्न कर शून्य में विलीन हो जाते हैं ।दुर्भाग्य है कि ऐसा पवित्र स्थान इस समय तथाकथित पाकिस्तान में है ।
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